शक्तिपीठ
धार्मिक स्थलों में शक्तिपीठ का महत्व आम लोगों के माता का दर्शन भर से नही है बल्कि धार्मिक कर्मकांड सिद्धि योग के लिए भी महत्वपूर्ण है।
माता शती के शरीर का अलग अलग अंग कई स्थलों पर गिरे और यही आज शक्तिपीठ कहलाता है।
वर्तमान में भारत ही नही बल्कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल देश मे भी शक्तिपीठ स्थापित है।


वहीं भारत मे अलग अलग राज्यों में भी मत सती के अंग गिरे और शक्तिपीठ कहलाया। कश्मीर से लेकर कन्या कुमारी तक और छतीसगढ़ से लेकर बंगाल तक शक्तिपीठ विद्यमान है।
51 शक्तिपीठ में से 5 शक्तिपीठ बंगाल क्षेत्र में है और सबसे महत्वपूर्ण तारापीठ है जहां माता का आंख गिरा था।
तारापीठ में सिद्धि के लिए विख्यात है। हजारो भक्त रोजाना माँ तारा का दर्शन के लिए आते हैं।
यहाँ अमावश्या के दिन विशेष पूजा की जाती है।
तारापीठ पश्चिम बंगाल के वीरभूमि जिले में स्थित है। यह जिला धार्मिक महत्व से बहुत प्रसिद्ध जिला है, क्योंकि हिन्दुओं के 51 शक्तिपीठों में से पांच शक्तिपीठ वीरभूमि जिले में ही है। बकुरेश्वर, नालहाटी, बन्दीकेश्वरी, फुलोरा देवी और तारापीठ। तारापीठ यहां का सबसे प्रमुख धार्मिक तीर्थ है और यह एक सिद्धपीठ भी है।
मां काली के कई स्वरूप है। शक्ति की देवी काली मां के हर रूप का ही महत्व अलग-अलग है। आज हम बात करेंगे तारा मां के बारे में,
तारा का अर्थ है आंख और पीठ का अर्थ है स्थल।
पौराणिक कथाओं के अनुसार सती मां का नयन इस स्थान पर गिरा था और ये एक शक्ति पीठ बन गई। हम यहां बात कर रहे हैं तारापीठ के बारे में जो कि पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में स्थित है। इस मंदिर की अपनी अलग ही खासियत है। इस मंदिर की महिमा के कारण दूर-दूर से लोगों का यहां साल भर तांता लगा रहता है।
कहा जाता है कि वशिष्ठ मुनि ने मां की कठिन तपस्या करके कई सारी सिद्धियों को प्राप्त किया था और उन्हीं ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था।हालांकि समय के चलते वो प्राचीन मंदिर मिट गया और अभी जो मंदिर आप देखते है उसे जयव्रत नाम के एक व्यवसायी ने बनवाया था। सूत्रों के अनुसार बताया जाता है कि तारापीठ मंदिर श्मशान घाट के समीप स्थित है। इस घाट को महाश्मशान घाट के नाम से जाना जाता है। यहां हैरान करने वाली बात ये है कि यहां महाश्मशान घाट में जलती चिता की अग्रि कभी नहीं बुझती है।मंदिर के चारों ओर द्वारका नदी बहती है। बामाखेपा नाम के एक साधक ने मां की कठिन साधना कर अनेकों सिद्धियों की प्राप्ति की थी। तारा मां और बामाखेपा को लेकर कई सारी अलौकिक घटनाएं आज भी चर्चित है। तन्त्र की साधना का हिंदू धर्म में काफी महत्व है और तारापीठ एक तन्त्र स्थल के लिए जाना जाता है। तारापीठ की शिलामयी मां का दर्शन केवल सुबह और शाम के समय श्रृंगार के समय ही होता है। एक ऐसी शक्तिपीठ जहां अघोरी कर रहे हैं चमत्कार, भक्तों का लगा रहता है तांता
तारापीठ की शिलामयी मां का दर्शन केवल सुबह और शाम के समय श्रृंगार के समय ही होता है।वैसे तो मां की आरती सुबह शाम दो बार होती है लेकिन नवरात्रि में अष्टमी के दिन मां की तीन बार आरती की जाती है। यहां मां को प्रसाद के रूप में नारियल,पेड़ा,इलायची दाना चढ़ाया जाता है। लोगों के बीच ऐसी मान्यता है कि महाश्मशान में पंचमुंडी के आसन पर बैठकर एकाग्र मन से तारा मां का तीन लाख बार जप करने से किसी भी साधक को सिद्धि की प्राप्ति हो जाती है। इस महापीठ के दर्शन से इंसान की सारी परेशानियां दूर हो जाती है।तारापीठ पश्चिम बंगाल के वीरभूमि जिले में स्थित है। यह जिला धार्मिक महत्व से बहुत प्रसिद्ध जिला है, क्योंकि हिन्दुओं के 51 शक्तिपीठों में से पांच शक्तिपीठ वीरभूमि जिले में ही है। बकुरेश्वर, नालहाटी, बन्दीकेश्वरी, फुलोरा देवी और तारापीठ। तारापीठ यहां का सबसे प्रमुख धार्मिक तीर्थ है। और यह एक सिद्धपीठ भी है। यहां पर एक सिद्ध पुरूष वामाखेपा का जन्म हुआ था, उनका पैतृक आवास आटला गांव में है। जो तारापीठ मंदिर से 2 किमी की दूरी है। कहते है कि वामाखेपा को माँ तारा के मंदिर के सामने महाश्मशान में तारा देवी के दर्शन हुए थे। वही पर वामाखेपा को सिद्धि प्राप्त हुई और वह सिद्ध पुरूष कहलाए। माँ तारा, काली माता का एक रूप है। मंदिर में माँ काली की मूर्ति की पूजा माँ तारा के रूप मे की जाती है।
